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तहरे
खातिर करेज कुहुकेला
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तहरा अइला से रात महकेला
तहरा गइला से रात डहकेला
तहरा छुअला से साँस बहकेला
नर्म होठन प आग दहकेला
तहरा हँसला से फूल खिल जाला
तहरा देखला से प्यार छलकेला
जब भी ताजा गुलाब देखीले
आँख मेँ तहरे चेहरा चमकेला
याद पहिला मिलन के आवे जब
तन-बदन,अंग-अंग चहकेला
काठ के हउवS आ कि पत्थर के
काहे ना दिल तोहार धडकेला
प्यासा सावन के देखियो के भी
काहे कुछ मेघ खाली कडकेला
तोहरा कुछ होला तS बुझा जाला
नींद ना आवे, आँख फडकेला
पाके चिट्ठी तोहार काहे दो
हमरा अँखियन से नेह ढरकेला
तहरा मालूम बा कि ना ‘भावुक’
तहरे खातिर करेज कुहुकेला |
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गजल
:- मनोज भावुक
भावुक के गजल हरेक शुक्रवार रात दस बजे

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